धर्मराज जी का भजन

(नोट: कथा के पहले या बाद में यह भजन गाना चाहिए।)

 

श्री धर्मराज सुणलो हमारी स्वामी विनती।।टेर।।

धर्मराज महाराज आप हो देवांरा सिरताज। निशदिन ध्यान आपका धरती रखना मेरी लाज।। श्री धर्मराज……….

चार भुजा प्रभु गदा हाथ में रूप बड़ा विकराल। अंकुश फांस देखकर पल में, होय दुष्ट पैमाल।। श्री धर्मराज……….

जो जैसा जग माहीं करते, पाप पुण्य के काज। फल उसका उनको भुगताते, धर्मराज महराज।। श्री धर्मराज………..

निशदिन ध्यान तुम्हारा धरते, करते अच्छे काम। उसको तुम सदमुक्ति देते, और स्वर्ग का धाम।। श्री धर्मराज…..

पल-पल रक्षा मेरी करना, रखना मेरा ध्यान। मैं शरणागत हूँ प्रभु तेरी, करती तव यशगान।। श्री धर्मराज………….

भक्तों प्रभु धर्मराज को, नमस्कार सतबार। देकर के प्रभु मुझे सहारा, करना भव सागर पार।। श्री धर्मराज……….

 

.उद्यापन विधि

श्री धर्मराज महाराज की कथा और उपासना का एक वर्ष पूर्ण हो जाए तो मकर संक्रान्ति के दिन इस व्रत-कथा का उद्यापन करना चाहिए। उद्यापन की संक्षिप्त विधि इस प्रकार है-अपने घर पर सुन्दर मण्डप बनाएँ जिसमें चार स्तम्भ हों। मण्डप और घर को सुन्दर वस्त्र, पुष्प एवं हरे पत्तों से सजाएँ। मण्डप के भीतर श्री धर्मराज जी एवं चित्रगुप्त जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। उनके सामने आचार्य द्वारा सर्वतोभद्रमण्डल स्थापित कराएँ। भद्रमण्डल से बाईं ओर नवग्रह तथा दाहिनी तरफ षोडषमातृका की स्थापना कराएँ। मातृका के समीप गणेश तथा ईशान कोण में रुद्र कलश स्थापित कर उस पर यथाशक्ति स्वर्ण या चाँदी की धर्मराज की मूर्ति स्थापित करें। तदनन्तर सभी देवताओं का पूजन करें और प्रधान देव के रूप में श्री धर्मराज जी महाराज का विनम्रभाव से श्रद्धायुक्त होकर षोडषोपचार से पूजन करें।

आचार्य द्वारा गणेश गौरी नवग्रह के निमित्त हवन और ग्रह शान्ति कराके श्री धर्मराज के निमित्त आहुति निम्नलिखित मन्त्रों से देनी चाहिए-

१.  ऊँ यमाय नमः स्वाहा।                                   २.  ऊँ धर्मराजाय नमः स्वाहा।

३.  ऊँ मृत्यवे नमः स्वाहा।                                  ४.  ऊँ अन्तकाय नमः स्वाहा।

५.  ऊँ वैवस्वताय नमः स्वाहा।                               ६.  ऊँ कालाय नमः ­­­स्वाहा।

७.  ऊँ सर्वभूतक्षयाय नमः स्वाहा।                             ८.  ऊँ औदुम्बराय नमः स्वाहा।

९.  ऊँ  दघ्नाय  नमः स्वाहा।                                १०. ऊँ नीलाय नमः स्वाहा।

११. ऊँ परमेष्ठिते नमः स्वाहा।                               १२. ऊँ वृकोदराय नमः स्वाहा।

१३. ऊँ चित्राय नमः स्वाहा।                                  १४. ऊँ चित्रगुप्ताय नमः स्वाहा।